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main-dhuundtaa-huun-jise-vo-jahaan-nahiin-miltaa-kaifi-azmi-ghazals |
मैं ढूँडता हूँ जिसे वो जहाँ नहीं मिलता
नई ज़मीन नया आसमाँ नहीं मिलता
नई ज़मीन नया आसमाँ भी मिल जाए
नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता
वो तेग़ मिल गई जिस से हुआ है क़त्ल मिरा
किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता
वो मेरा गाँव है वो मेरे गाँव के चूल्हे
कि जिन में शोले तो शोले धुआँ नहीं मिलता
जो इक ख़ुदा नहीं मि... |
haath-aa-kar-lagaa-gayaa-koii-kaifi-azmi-ghazals |
हाथ आ कर लगा गया कोई
मेरा छप्पर उठा गया कोई
लग गया इक मशीन में मैं भी
शहर में ले के आ गया कोई
मैं खड़ा था कि पीठ पर मेरी
इश्तिहार इक लगा गया कोई
ये सदी धूप को तरसती है
जैसे सूरज को खा गया कोई
ऐसी महँगाई है कि चेहरा भी
बेच के अपना खा गया कोई
अब वो अरमान हैं न वो सपने
सब कबूतर उड़ा गया कोई
वो गए जब से ऐसा लग... |
kyaa-jaane-kis-kii-pyaas-bujhaane-kidhar-gaiin-kaifi-azmi-ghazals |
क्या जाने किस की प्यास बुझाने किधर गईं
इस सर पे झूम के जो घटाएँ गुज़र गईं
दीवाना पूछता है ये लहरों से बार बार
कुछ बस्तियाँ यहाँ थीं बताओ किधर गईं
अब जिस तरफ़ से चाहे गुज़र जाए कारवाँ
वीरानियाँ तो सब मिरे दिल में उतर गईं
पैमाना टूटने का कोई ग़म नहीं मुझे
ग़म है तो ये कि चाँदनी रातें बिखर गईं
पाया भी उन को खो भी... |
shor-yuunhii-na-parindon-ne-machaayaa-hogaa-kaifi-azmi-ghazals |
शोर यूँही न परिंदों ने मचाया होगा
कोई जंगल की तरफ़ शहर से आया होगा
पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था
जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा
बानी-ए-जश्न-ए-बहाराँ ने ये सोचा भी नहीं
किस ने काँटों को लहू अपना पिलाया होगा
बिजली के तार पे बैठा हुआ हँसता पंछी
सोचता है कि वो जंगल तो पराया होगा
अपने जंगल से जो घबरा ... |
khaar-o-khas-to-uthen-raasta-to-chale-kaifi-azmi-ghazals |
ख़ार-ओ-ख़स तो उठें रास्ता तो चले
मैं अगर थक गया क़ाफ़िला तो चले
चाँद सूरज बुज़ुर्गों के नक़्श-ए-क़दम
ख़ैर बुझने दो उन को हवा तो चले
हाकिम-ए-शहर ये भी कोई शहर है
मस्जिदें बंद हैं मय-कदा तो चले
उस को मज़हब कहो या सियासत कहो
ख़ुद-कुशी का हुनर तुम सिखा तो चले
इतनी लाशें मैं कैसे उठा पाऊँगा
आप ईंटों की हुरमत बचा त... |
itnaa-to-zindagii-men-kisii-ke-khalal-pade-kaifi-azmi-ghazals |
इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े
हँसने से हो सुकून न रोने से कल पड़े
जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े
इक तुम कि तुम को फ़िक्र-ए-नशेब-ओ-फ़राज़ है
इक हम कि चल पड़े तो बहर-हाल चल पड़े
साक़ी सभी को है ग़म-ए-तिश्ना-लबी मगर
मय है उसी की नाम पे जिस के उबल पड़े
मुद्दत क... |
tum-itnaa-jo-muskuraa-rahe-ho-kaifi-azmi-ghazals |
तुम इतना जो मुस्कुरा रहे हो
क्या ग़म है जिस को छुपा रहे हो
आँखों में नमी हँसी लबों पर
क्या हाल है क्या दिखा रहे हो
बन जाएँगे ज़हर पीते पीते
ये अश्क जो पीते जा रहे हो
जिन ज़ख़्मों को वक़्त भर चला है
तुम क्यूँ उन्हें छेड़े जा रहे हो
रेखाओं का खेल है मुक़द्दर
रेखाओं से मात खा रहे हो |
laaii-phir-ek-lagzish-e-mastaana-tere-shahr-men-kaifi-azmi-ghazals |
लाई फिर इक लग़्ज़िश-ए-मस्ताना तेरे शहर में
फिर बनेंगी मस्जिदें मय-ख़ाना तेरे शहर में
आज फिर टूटेंगी तेरे घर की नाज़ुक खिड़कियाँ
आज फिर देखा गया दीवाना तेरे शहर में
जुर्म है तेरी गली से सर झुका कर लौटना
कुफ़्र है पथराव से घबराना तेरे शहर में
शाह-नामे लिक्खे हैं खंडरात की हर ईंट पर
हर जगह है दफ़्न इक अफ़्साना तेर... |
vo-bhii-saraahne-lage-arbaab-e-fan-ke-baad-kaifi-azmi-ghazals |
वो भी सराहने लगे अर्बाब-ए-फ़न के बा'द
दाद-ए-सुख़न मिली मुझे तर्क-ए-सुख़न के बा'द
दीवाना-वार चाँद से आगे निकल गए
ठहरा न दिल कहीं भी तिरी अंजुमन के बा'द
होंटों को सी के देखिए पछ्ताइएगा आप
हंगामे जाग उठते हैं अक्सर घुटन के बा'द
ग़ुर्बत की ठंडी छाँव में याद आई उस की धूप
क़द्र-ए-वतन हुई हमें तर्क-ए-वतन के बा'द
एलान... |
jhukii-jhukii-sii-nazar-be-qaraar-hai-ki-nahiin-kaifi-azmi-ghazals |
झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं
तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता
मिरी तरह तिरा दिल बे-क़रार है कि नहीं
वो पल कि जिस में मोहब्बत जवान होती है
उस एक पल का तुझे इंतिज़ार है कि नहीं
तिरी उमीद पे ठुकरा रहा हूँ दुनिया को
तुझे भी अपने पे ये ए'तिबार है कि नहीं |
sunaa-karo-mirii-jaan-in-se-un-se-afsaane-kaifi-azmi-ghazals |
सुना करो मिरी जाँ इन से उन से अफ़्साने
सब अजनबी हैं यहाँ कौन किस को पहचाने
यहाँ से जल्द गुज़र जाओ क़ाफ़िले वालो
हैं मेरी प्यास के फूँके हुए ये वीराने
मिरे जुनून-ए-परस्तिश से तंग आ गए लोग
सुना है बंद किए जा रहे हैं बुत-ख़ाने
जहाँ से पिछले पहर कोई तिश्ना-काम उठा
वहीं पे तोड़े हैं यारों ने आज पैमाने
बहार आए तो मे... |
kii-hai-koii-hasiin-khataa-har-khataa-ke-saath-kaifi-azmi-ghazals |
की है कोई हसीन ख़ता हर ख़ता के साथ
थोड़ा सा प्यार भी मुझे दे दो सज़ा के साथ
गर डूबना ही अपना मुक़द्दर है तो सुनो
डूबेंगे हम ज़रूर मगर नाख़ुदा के साथ
मंज़िल से वो भी दूर था और हम भी दूर थे
हम ने भी धूल उड़ाई बहुत रहनुमा के साथ
रक़्स-ए-सबा के जश्न में हम तुम भी नाचते
ऐ काश तुम भी आ गए होते सबा के साथ
इक्कीसवीं स... |
kahiin-se-laut-ke-ham-ladkhadaae-hain-kyaa-kyaa-kaifi-azmi-ghazals |
कहीं से लौट के हम लड़खड़ाए हैं क्या क्या
सितारे ज़ेर-ए-क़दम रात आए हैं क्या क्या
नशेब-ए-हस्ती से अफ़्सोस हम उभर न सके
फ़राज़-ए-दार से पैग़ाम आए हैं क्या क्या
जब उस ने हार के ख़ंजर ज़मीं पे फेंक दिया
तमाम ज़ख़्म-ए-जिगर मुस्कुराए हैं क्या क्या
छटा जहाँ से उस आवाज़ का घना बादल
वहीं से धूप ने तलवे जलाए हैं क्या क्य... |
patthar-ke-khudaa-vahaan-bhii-paae-kaifi-azmi-ghazals |
पत्थर के ख़ुदा वहाँ भी पाए
हम चाँद से आज लौट आए
दीवारें तो हर तरफ़ खड़ी हैं
क्या हो गए मेहरबान साए
जंगल की हवाएँ आ रही हैं
काग़ज़ का ये शहर उड़ न जाए
लैला ने नया जनम लिया है
है क़ैस कोई जो दिल लगाए
है आज ज़मीं का ग़ुस्ल-ए-सेह्हत
जिस दिल में हो जितना ख़ून लाए
सहरा सहरा लहू के खे़मे
फिर प्यासे लब-ए-फ़ुरात आए |
jo-vo-mire-na-rahe-main-bhii-kab-kisii-kaa-rahaa-kaifi-azmi-ghazals-1 |
जो वो मिरे न रहे मैं भी कब किसी का रहा
बिछड़ के उन से सलीक़ा न ज़िंदगी का रहा
लबों से उड़ गया जुगनू की तरह नाम उस का
सहारा अब मिरे घर में न रौशनी का रहा
गुज़रने को तो हज़ारों ही क़ाफ़िले गुज़रे
ज़मीं पे नक़्श-ए-क़दम बस किसी किसी का रहा |
aaj-sochaa-to-aansuu-bhar-aae-kaifi-azmi-ghazals-1 |
आज सोचा तो आँसू भर आए
मुद्दतें हो गईं मुस्कुराए
हर क़दम पर उधर मुड़ के देखा
उन की महफ़िल से हम उठ तो आए
रह गई ज़िंदगी दर्द बन के
दर्द दिल में छुपाए छुपाए
दिल की नाज़ुक रगें टूटती हैं
याद इतना भी कोई न आए |
milne-kii-tarah-mujh-se-vo-pal-bhar-nahiin-miltaa-naseer-turabi-ghazals |
मिलने की तरह मुझ से वो पल भर नहीं मिलता
दिल उस से मिला जिस से मुक़द्दर नहीं मिलता
ये राह-ए-तमन्ना है यहाँ देख के चलना
इस राह में सर मिलते हैं पत्थर नहीं मिलता
हमरंगी-ए-मौसम के तलबगार न होते
साया भी तो क़ामत के बराबर नहीं मिलता
कहने को ग़म-ए-हिज्र बड़ा दुश्मन-ए-जाँ है
पर दोस्त भी इस दोस्त से बेहतर नहीं मिलता
कु... |
vo-ham-safar-thaa-magar-us-se-ham-navaaii-na-thii-naseer-turabi-ghazals |
वो हम-सफ़र था मगर उस से हम-नवाई न थी
कि धूप छाँव का आलम रहा जुदाई न थी
न अपना रंज न औरों का दुख न तेरा मलाल
शब-ए-फ़िराक़ कभी हम ने यूँ गँवाई न थी
मोहब्बतों का सफ़र इस तरह भी गुज़रा था
शिकस्ता-दिल थे मुसाफ़िर शिकस्ता-पाई न थी
अदावतें थीं, तग़ाफ़ुल था, रंजिशें थीं बहुत
बिछड़ने वाले में सब कुछ था, बेवफ़ाई न थी
बि... |
is-kadii-dhuup-men-saaya-kar-ke-naseer-turabi-ghazals |
इस कड़ी धूप में साया कर के
तू कहाँ है मुझे तन्हा कर के
मैं तो अर्ज़ां था ख़ुदा की मानिंद
कौन गुज़रा मिरा सौदा कर के
तीरगी टूट पड़ी है मुझ पर
मैं पशीमाँ हूँ उजाला कर के
ले गया छीन के आँखें मेरी
मुझ से क्यूँ वादा-ए-फ़र्दा कर के
लौ इरादों की बढ़ा दी शब ने
दिन गया जब मुझे पसपा कर के
काश ये आईना-ए-हिज्र-ओ-विसाल
... |
tujhe-kyaa-khabar-mire-be-khabar-miraa-silsila-koii-aur-hai-naseer-turabi-ghazals-3 |
तुझे क्या ख़बर मिरे बे-ख़बर मिरा सिलसिला कोई और है
जो मुझी को मुझ से बहम करे वो गुरेज़-पा कोई और है
मिरे मौसमों के भी तौर थे मिरे बर्ग-ओ-बार ही और थे
मगर अब रविश है अलग कोई मगर अब हवा कोई और है
यही शहर शहर-ए-क़रार है तो दिल-ए-शिकस्ता की ख़ैर हो
मिरी आस है किसी और से मुझे पूछता कोई और है
ये वो माजरा-ए-फ़िराक़ है ... |
marham-e-vaqt-na-ejaaz-e-masiihaaii-hai-naseer-turabi-ghazals |
मरहम-ए-वक़्त न एजाज़-ए-मसीहाई है
ज़िंदगी रोज़ नए ज़ख़्म की गहराई है
फिर मिरे घर की फ़ज़ाओं में हुआ सन्नाटा
फिर दर-ओ-बाम से अंदेशा-ए-गोयाई है
तुझ से बिछड़ूँ तो कोई फूल न महके मुझ में
देख क्या कर्ब है क्या ज़ात की सच्चाई है
तेरा मंशा तिरे लहजे की धनक में देखा
तिरी आवाज़ भी शायद तिरी अंगड़ाई है
कुछ अजब गर्दिश-ए-प... |
diyaa-saa-dil-ke-kharaabe-men-jal-rahaa-hai-miyaan-naseer-turabi-ghazals |
दिया सा दिल के ख़राबे में जल रहा है मियाँ
दिए के गिर्द कोई अक्स चल रहा है मियाँ
ये रूह रक़्स-ए-चराग़ाँ है अपने हल्क़े में
ये जिस्म साया है और साया ढल रहा मियाँ
ये आँख पर्दा है इक गर्दिश-ए-तहय्युर का
ये दिल नहीं है बगूला उछल रहा है मियाँ
कभी किसी का गुज़रना कभी ठहर जाना
मिरे सुकूत में क्या क्या ख़लल रहा है म... |
sukuut-e-shaam-se-ghabraa-na-jaae-aakhir-tuu-naseer-turabi-ghazals |
सुकूत-ए-शाम से घबरा न जाए आख़िर तू
मिरे दयार से गुज़री जो ऐ किरन फिर तू
लिबास-ए-जाँ में नहीं शो'लगी का रंग मगर
झुलस रहा है मिरे साथ क्यूँ ब-ज़ाहिर तू
वफ़ा-ए-वा'दा-ओ-पैमाँ का ए'तिबार भी क्या
कि मैं तो साहब-ए-ईमाँ हूँ और मुंकिर तू
मिरे वजूद में इक बे-ज़बाँ समुंदर है
उतर के देख सफ़ीने से मेरी ख़ातिर तू
मैं शाख़-ए... |
main-bhii-ai-kaash-kabhii-mauj-e-sabaa-ho-jaauun-naseer-turabi-ghazals |
मैं भी ऐ काश कभी मौज-ए-सबा हो जाऊँ
इस तवक़्क़ो पे कि ख़ुद से भी जुदा हो जाऊँ
अब्र उट्ठे तो सिमट जाऊँ तिरी आँखों में
धूप निकले तो तिरे सर की रिदा हो जाऊँ
आज की रात उजाले मिरे हम-साया हैं
आज की रात जो सो लूँ तो नया हो जाऊँ
अब यही सोच लिया दिल में कि मंज़िल के बग़ैर
घर पलट आऊँ तो मैं आबला-पा हो जाऊँ
फूल की तरह मह... |
rache-base-hue-lamhon-se-jab-hisaab-huaa-naseer-turabi-ghazals |
रचे-बसे हुए लम्हों से जब हिसाब हुआ
गए दिनों की रुतों का ज़ियाँ सवाब हुआ
गुज़र गया तो पस-ए-मौज बे-कनारी थी
ठहर गया तो वो दरिया मुझे सराब हुआ
सुपुर्दगी के तक़ाज़े कहाँ कहाँ से पढ़ूँ
हुनर के बाब में पैकर तिरा किताब हुआ
हर आरज़ू मिरी आँखों की रौशनी ठहरी
चराग़ सोच में गुम हैं ये क्या अज़ाब हुआ
कुछ अजनबी से लगे आश्न... |
dard-kii-dhuup-se-chehre-ko-nikhar-jaanaa-thaa-naseer-turabi-ghazals |
दर्द की धूप से चेहरे को निखर जाना था
आइना देखने वाले तुझे मर जाना था
राह में ऐसे नुक़ूश-ए-कफ़-ए-पा भी आए
मैं ने दानिस्ता जिन्हें गर्द-ए-सफ़र जाना था
वहम-ओ-इदराक के हर मोड़ पे सोचा मैं ने
तू कहाँ है मिरे हमराह अगर जाना था
आगही ज़ख़्म-ए-नज़ारा न बनी थी जब तक
मैं ने हर शख़्स को महबूब-ए-नज़र जाना था
क़ुर्बतें रेत ... |
ham-rahii-kii-baat-mat-kar-imtihaan-ho-jaaegaa-naseer-turabi-ghazals |
हम-रही की बात मत कर इम्तिहाँ हो जाएगा
हम सुबुक हो जाएँगे तुझ को गिराँ हो जाएगा
जब बहार आ कर गुज़र जाएगी ऐ सर्व-ए-बहार
एक रंग अपना भी पैवंद-ए-ख़िज़ाँ हो जाएगा
साअत-ए-तर्क-ए-तअल्लुक़ भी क़रीब आ ही गई
क्या ये अपना सब तअल्लुक़ राएगाँ हो जाएगा
ये हवा सारे चराग़ों को उड़ा ले जाएगी
रात ढलने तक यहाँ सब कुछ धुआँ हो जाएगा... |
misl-e-sahraa-hai-rifaaqat-kaa-chaman-bhii-ab-ke-naseer-turabi-ghazals |
मिस्ल-ए-सहरा है रिफ़ाक़त का चमन भी अब के
जल बुझा अपने ही शो'लों में बदन भी अब के
ख़ार-ओ-ख़स हूँ तो शरर-ख़ेज़ियाँ देखूँ फिर से
आँख ले आई है इक ऐसी किरन भी अब के
हम तो वो फूल जो शाख़ों पे ये सोचें पहरों
क्यूँ सबा भूल गई अपना चलन भी अब के
मंज़िलों तक नज़र आता है शिकस्तों का ग़ुबार
साथ देती नहीं ऐसे में थकन भी अब के... |
sabaa-kaa-narm-saa-jhonkaa-bhii-taaziyaana-huaa-naseer-turabi-ghazals-1 |
सबा का नर्म सा झोंका भी ताज़ियाना हुआ
ये वार मुझ पे हुआ भी तो ग़ाएबाना हुआ
उसी ने मुझ पे उठाए हैं संग जिस के लिए
मैं पाश पाश हुआ घर निगार-ख़ाना हुआ
झुलस रहा था बदन गर्मी-ए-नफ़स से मगर
तिरे ख़याल का ख़ुर्शीद शामियाना हुआ
ख़ुद अपने हिज्र की ख़्वाहिश मुझे अज़ीज़ रही
ये तेरे वस्ल का क़िस्सा तो इक बहाना हुआ
ख़ुदा क... |
koii-aavaaz-na-aahat-na-khayaal-aise-men-naseer-turabi-ghazals |
कोई आवाज़ न आहट न ख़याल ऐसे में
रात महकी है मगर जी है निढाल ऐसे में
मेरे अतराफ़ तो गिरती हुई दीवारें हैं
साया-ए-उम्र-ए-रवाँ मुझ को सँभाल ऐसे में
जब भी चढ़ते हुए दरिया में सफ़ीना उतरा
याद आया तिरे लहजे का कमाल ऐसे में
आँख खुलती है तो सब ख़्वाब बिखर जाते हैं
सोचता हूँ कि बिछा दूँ कोई जाल ऐसे में
मुद्दतों बा'द अग... |
dekh-lete-hain-ab-us-baam-ko-aate-jaate-naseer-turabi-ghazals |
देख लेते हैं अब उस बाम को आते जाते
ये भी आज़ार चला जाएगा जाते जाते
दिल के सब नक़्श थे हाथों की लकीरों जैसे
नक़्श-ए-पा होते तो मुमकिन था मिटाते जाते
थी कभी राह जो हम-राह गुज़रने वाली
अब हज़र होता है उस राह से आते जाते
शहर-ए-बे-मेहर! कभी हम को भी मोहलत देता
इक दिया हम भी किसी रुख़ से जलाते जाते
पारा-ए-अब्र-ए-गुर... |
injiil-e-raftagaan-kii-hadiison-ke-saath-huun-naseer-turabi-ghazals |
इंजील-ए-रफ़्तगाँ की हदीसों के साथ हूँ
ईसा-नफ़स हूँ और सलीबों के साथ हूँ
पाबंद-ए-रंग-ओ-नक़्श हूँ तस्वीर की तरह
मैं बे-हिजाब अपने हिजाबों के साथ हूँ
औराक़-ए-आरज़ू पे ब-उन्वान-ए-जाँ-कनी
मैं बे-निशाँ सी चंद लकीरों के साथ हूँ
शायद ये इंतिज़ार की लौ फ़ैसला करे
मैं अपने साथ हूँ कि दरीचों के साथ हूँ
तू फ़तह-मंद मेरा त... |
ishq-e-laa-mahduud-jab-tak-rahnumaa-hotaa-nahiin-jigar-moradabadi-ghazals |
इश्क़-ए-ला-महदूद जब तक रहनुमा होता नहीं
ज़िंदगी से ज़िंदगी का हक़ अदा होता नहीं
बे-कराँ होता नहीं बे-इंतिहा होता नहीं
क़तरा जब तक बढ़ के क़ुल्ज़ुम-आश्ना होता नहीं
उस से बढ़ कर दोस्त कोई दूसरा होता नहीं
सब जुदा हो जाएँ लेकिन ग़म जुदा होता नहीं
ज़िंदगी इक हादसा है और कैसा हादसा
मौत से भी ख़त्म जिस का सिलसिला होता... |
ab-to-ye-bhii-nahiin-rahaa-ehsaas-jigar-moradabadi-ghazals |
अब तो ये भी नहीं रहा एहसास
दर्द होता है या नहीं होता
इश्क़ जब तक न कर चुके रुस्वा
आदमी काम का नहीं होता
टूट पड़ता है दफ़अ'तन जो इश्क़
बेश-तर देर-पा नहीं होता
वो भी होता है एक वक़्त कि जब
मा-सिवा मा-सिवा नहीं होता
हाए क्या हो गया तबीअ'त को
ग़म भी राहत-फ़ज़ा नहीं होता
दिल हमारा है या तुम्हारा है
हम से ये फ़ैस... |
jo-ab-bhii-na-takliif-farmaaiyegaa-jigar-moradabadi-ghazals |
जो अब भी न तकलीफ़ फ़रमाइएगा
तो बस हाथ मलते ही रह जाइएगा
निगाहों से छुप कर कहाँ जाइएगा
जहाँ जाइएगा हमें पाइएगा
मिरा जब बुरा हाल सुन पाइएगा
ख़िरामाँ ख़िरामाँ चले आइएगा
मिटा कर हमें आप पछ्ताइएगा
कमी कोई महसूस फ़रमाइएगा
नहीं खेल नासेह जुनूँ की हक़ीक़त
समझ लीजिएगा तो समझाइएगा
हमें भी ये अब देखना है कि हम पर
कहाँ... |
kiyaa-taajjub-ki-mirii-ruuh-e-ravaan-tak-pahunche-jigar-moradabadi-ghazals |
किया तअ'ज्जुब कि मिरी रूह-ए-रवाँ तक पहुँचे
पहले कोई मिरे नग़्मों की ज़बाँ तक पहुँचे
जब हर इक शोरिश-ए-ग़म ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ तक पहुँचे
फिर ख़ुदा जाने ये हंगामा कहाँ तक पहुँचे
आँख तक दिल से न आए न ज़बाँ तक पहुँचे
बात जिस की है उसी आफ़त-ए-जाँ तक पहुँचे
तू जहाँ पर था बहुत पहले वहीं आज भी है
देख रिंदान-ए-ख़ुश-अन्फ़ास क... |
vo-jo-ruuthen-yuun-manaanaa-chaahiye-jigar-moradabadi-ghazals |
वो जो रूठें यूँ मनाना चाहिए
ज़िंदगी से रूठ जाना चाहिए
हिम्मत-ए-क़ातिल बढ़ाना चाहिए
ज़ेर-ए-ख़ंजर मुस्कुराना चाहिए
ज़िंदगी है नाम जोहद ओ जंग का
मौत क्या है भूल जाना चाहिए
है इन्हीं धोकों से दिल की ज़िंदगी
जो हसीं धोका हो खाना चाहिए
लज़्ज़तें हैं दुश्मन-ए-औज-ए-कमाल
कुल्फ़तों से जी लगाना चाहिए
उन से मिलने को तो ... |
allaah-agar-taufiiq-na-de-insaan-ke-bas-kaa-kaam-nahiin-jigar-moradabadi-ghazals |
अल्लाह अगर तौफ़ीक़ न दे इंसान के बस का काम नहीं
फ़ैज़ान-ए-मोहब्बत आम सही इरफ़ान-ए-मोहब्बत आम नहीं
ये तू ने कहा क्या ऐ नादाँ फ़य्याज़ी-ए-क़ुदरत आम नहीं
तू फ़िक्र ओ नज़र तो पैदा कर क्या चीज़ है जो इनआम नहीं
या-रब ये मक़ाम-ए-इश्क़ है क्या गो दीदा-ओ-दिल नाकाम नहीं
तस्कीन है और तस्कीन नहीं आराम है और आराम नहीं
क्यूँ ... |
dil-ko-sukuun-ruuh-ko-aaraam-aa-gayaa-jigar-moradabadi-ghazals |
दिल को सुकून रूह को आराम आ गया
मौत आ गई कि दोस्त का पैग़ाम आ गया
जब कोई ज़िक्र-ए-गर्दिश-ए-अय्याम आ गया
बे-इख़्तियार लब पे तिरा नाम आ गया
ग़म में भी है सुरूर वो हंगाम आ गया
शायद कि दौर-ए-बादा-ए-गुलफ़ाम आ गया
दीवानगी हो अक़्ल हो उम्मीद हो कि यास
अपना वही है वक़्त पे जो काम आ गया
दिल के मुआमलात में नासेह शिकस्त क... |
sharmaa-gae-lajaa-gae-daaman-chhudaa-gae-jigar-moradabadi-ghazals |
शरमा गए लजा गए दामन छुड़ा गए
ऐ इश्क़ मर्हबा वो यहाँ तक तो आ गए
दिल पर हज़ार तरह के औहाम छा गए
ये तुम ने क्या किया मिरी दुनिया में आ गए
सब कुछ लुटा के राह-ए-मोहब्बत में अहल-ए-दिल
ख़ुश हैं कि जैसे दौलत-ए-कौनैन पा गए
सेहन-ए-चमन को अपनी बहारों पे नाज़ था
वो आ गए तो सारी बहारों पे छा गए
अक़्ल ओ जुनूँ में सब की थीं ... |
ham-ko-mitaa-sake-ye-zamaane-men-dam-nahiin-jigar-moradabadi-ghazals |
हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं
बे-फ़ाएदा अलम नहीं बे-कार ग़म नहीं
तौफ़ीक़ दे ख़ुदा तो ये नेमत भी कम नहीं
मेरी ज़बाँ पे शिकवा-ए-अहल-ए-सितम नहीं
मुझ को जगा दिया यही एहसान कम नहीं
या रब हुजूम-ए-दर्द को दे और वुसअ'तें
दामन तो क्या अभी मिरी आँखें भी नम नहीं
शिकवा तो एक छ... |
aadmii-aadmii-se-miltaa-hai-jigar-moradabadi-ghazals |
आदमी आदमी से मिलता है
दिल मगर कम किसी से मिलता है
भूल जाता हूँ मैं सितम उस के
वो कुछ इस सादगी से मिलता है
आज क्या बात है कि फूलों का
रंग तेरी हँसी से मिलता है
सिलसिला फ़ित्ना-ए-क़यामत का
तेरी ख़ुश-क़ामती से मिलता है
मिल के भी जो कभी नहीं मिलता
टूट कर दिल उसी से मिलता है
कारोबार-ए-जहाँ सँवरते हैं
होश जब बे-ख... |
mohabbat-men-ye-kyaa-maqaam-aa-rahe-hain-jigar-moradabadi-ghazals |
मोहब्बत में ये क्या मक़ाम आ रहे हैं
कि मंज़िल पे हैं और चले जा रहे हैं
ये कह कह के हम दिल को बहला रहे हैं
वो अब चल चुके हैं वो अब आ रहे हैं
वो अज़-ख़ुद ही नादिम हुए जा रहे हैं
ख़ुदा जाने क्या क्या ख़याल आ रहे हैं
हमारे ही दिल से मज़े उन के पूछो
वो धोके जो दानिस्ता हम खा रहे हैं
जफ़ा करने वालों को क्या हो गया ह... |
us-kii-nazron-men-intikhaab-huaa-jigar-moradabadi-ghazals |
उस की नज़रों में इंतिख़ाब हुआ
दिल अजब हुस्न से ख़राब हुआ
इश्क़ का सेहर कामयाब हुआ
मैं तिरा तू मिरा जवाब हुआ
हर नफ़स मौज-ए-इज़्तिराब हुआ
ज़िंदगी क्या हुई अज़ाब हुआ
जज़्बा-ए-शौक़ कामयाब हुआ
आज मुझ से उन्हें हिजाब हुआ
मैं बनूँ किस लिए न मस्त-ए-शराब
क्यूँ मुजस्सम कोई शबाब हुआ
निगह-ए-नाज़ ले ख़बर वर्ना
दर्द महबू... |
laakhon-men-intikhaab-ke-qaabil-banaa-diyaa-jigar-moradabadi-ghazals |
लाखों में इंतिख़ाब के क़ाबिल बना दिया
जिस दिल को तुम ने देख लिया दिल बना दिया
हर-चंद कर दिया मुझे बर्बाद इश्क़ ने
लेकिन उन्हें तो शेफ़्ता-ए-दिल बना दिया
पहले कहाँ ये नाज़ थे ये इश्वा ओ अदा
दिल को दुआएँ दो तुम्हें क़ातिल बना दिया |
ai-husn-e-yaar-sharm-ye-kyaa-inqalaab-hai-jigar-moradabadi-ghazals |
ऐ हुस्न-ए-यार शर्म ये क्या इंक़लाब है
तुझ से ज़ियादा दर्द तिरा कामयाब है
आशिक़ की बे-दिली का तग़ाफ़ुल नहीं जवाब
उस का बस एक जोश-ए-मोहब्बत जवाब है
तेरी इनायतें कि नहीं नज़्र-ए-जाँ क़ुबूल
तेरी नवाज़िशें कि ज़माना ख़राब है
ऐ हुस्न अपनी हौसला-अफ़ज़ाइयाँ तो देख
माना कि चश्म-ए-शौक़ बहुत बे-हिजाब है
मैं इश्क़-ए-बे-नि... |
sabhii-andaaz-e-husn-pyaare-hain-jigar-moradabadi-ghazals |
सभी अंदाज़-ए-हुस्न प्यारे हैं
हम मगर सादगी के मारे हैं
उस की रातों का इंतिक़ाम न पूछ
जिस ने हँस हँस के दिन गुज़ारे हैं
ऐ सहारों की ज़िंदगी वालो
कितने इंसान बे-सहारे हैं
लाला-ओ-गुल से तुझ को क्या निस्बत
ना-मुकम्मल से इस्तिआ'रे हैं
हम तो अब डूब कर ही उभरेंगे
वो रहें शाद जो किनारे हैं
शब-ए-फ़ुर्क़त भी जगमगा उट्... |
dil-gayaa-raunaq-e-hayaat-gaii-jigar-moradabadi-ghazals |
दिल गया रौनक़-ए-हयात गई
ग़म गया सारी काएनात गई
दिल धड़कते ही फिर गई वो नज़र
लब तक आई न थी कि बात गई
दिन का क्या ज़िक्र तीरा-बख़्तों में
एक रात आई एक रात गई
तेरी बातों से आज तो वाइ'ज़
वो जो थी ख़्वाहिश-ए-नजात गई
उन के बहलाए भी न बहला दिल
राएगाँ सई-ए-इल्तिफ़ात गई
मर्ग-ए-आशिक़ तो कुछ नहीं लेकिन
इक मसीहा-नफ़स क... |
tabiiat-in-dinon-begaana-e-gam-hotii-jaatii-hai-jigar-moradabadi-ghazals |
तबीअत इन दिनों बेगाना-ए-ग़म होती जाती है
मिरे हिस्से की गोया हर ख़ुशी कम होती जाती है
सहर होने को है बेदार शबनम होती जाती है
ख़ुशी मंजुमला-ओ-अस्बाब-ए-मातम होती जाती है
क़यामत क्या ये ऐ हुस्न-ए-दो-आलम होती जाती है
कि महफ़िल तो वही है दिल-कशी कम होती जाती है
वही मय-ख़ाना-ओ-सहबा वही साग़र वही शीशा
मगर आवाज़-ए-नोशा... |
fikr-e-manzil-hai-na-hosh-e-jaada-e-manzil-mujhe-jigar-moradabadi-ghazals |
फ़िक्र-ए-मंज़िल है न होश-ए-जादा-ए-मंज़िल मुझे
जा रहा हूँ जिस तरफ़ ले जा रहा है दिल मुझे
अब ज़बाँ भी दे अदा-ए-शुक्र के क़ाबिल मुझे
दर्द बख़्शा है अगर तू ने बजाए-दिल मुझे
यूँ तड़प कर दिल ने तड़पाया सर-ए-महफ़िल मुझे
उस को क़ातिल कहने वाले कह उठे क़ातिल मुझे
अब किधर जाऊँ बता ऐ जज़्बा-ए-कामिल मुझे
हर तरफ़ से आज आती ... |
tujhii-se-ibtidaa-hai-tuu-hii-ik-din-intihaa-hogaa-jigar-moradabadi-ghazals |
तुझी से इब्तिदा है तू ही इक दिन इंतिहा होगा
सदा-ए-साज़ होगी और न साज़-ए-बे-सदा होगा
हमें मालूम है हम से सुनो महशर में क्या होगा
सब उस को देखते होंगे वो हम को देखता होगा
सर-ए-महशर हम ऐसे आसियों का और क्या होगा
दर-ए-जन्नत न वा होगा दर-ए-रहमत तो वा होगा
जहन्नम हो कि जन्नत जो भी होगा फ़ैसला होगा
ये क्या कम है हमारा... |
yaadash-ba-khair-jab-vo-tasavvur-men-aa-gayaa-jigar-moradabadi-ghazals |
यादश-ब-ख़ैर जब वो तसव्वुर में आ गया
शे'र ओ शबाब ओ हुस्न का दरिया बहा गया
जब इश्क़ अपने मरकज़-ए-असली पे आ गया
ख़ुद बन गया हसीन दो आलम पे छा गया
जो दिल का राज़ था उसे कुछ दिल ही पा गया
वो कर सके बयाँ न हमीं से कहा गया
नासेह फ़साना अपना हँसी में उड़ा गया
ख़ुश-फ़िक्र था कि साफ़ ये पहलू बचा गया
अपना ज़माना आप बनाते... |
ye-hai-mai-kada-yahaan-rind-hain-yahaan-sab-kaa-saaqii-imaam-hai-jigar-moradabadi-ghazals |
ये है मय-कदा यहाँ रिंद हैं यहाँ सब का साक़ी इमाम है
ये हरम नहीं है ऐ शैख़ जी यहाँ पारसाई हराम है
जो ज़रा सी पी के बहक गया उसे मय-कदे से निकाल दो
यहाँ तंग-नज़र का गुज़र नहीं यहाँ अहल-ए-ज़र्फ़ का काम है
कोई मस्त है कोई तिश्ना-लब तो किसी के हाथ में जाम है
मगर इस पे कोई करे भी क्या ये तो मय-कदे का निज़ाम है
ये जनाब-... |
aayaa-na-raas-naala-e-dil-kaa-asar-mujhe-jigar-moradabadi-ghazals |
आया न रास नाला-ए-दिल का असर मुझे
अब तुम मिले तो कुछ नहीं अपनी ख़बर मुझे
दिल ले के मुझ से देते हो दाग़-ए-जिगर मुझे
ये बात भूलने की नहीं उम्र भर मुझे
हर-सू दिखाई देते हैं वो जल्वा-गर मुझे
क्या क्या फ़रेब देती है मेरी नज़र मुझे
मिलती नहीं है लज़्ज़त-ए-दर्द-ए-जिगर मुझे
भूली हुई न हो निगह-ए-फ़ित्नागर मुझे
डाला है ब... |
dil-men-kisii-ke-raah-kiye-jaa-rahaa-huun-main-jigar-moradabadi-ghazals |
दिल में किसी के राह किए जा रहा हूँ मैं
कितना हसीं गुनाह किए जा रहा हूँ मैं
दुनिया-ए-दिल तबाह किए जा रहा हूँ मैं
सर्फ़-ए-निगाह-ओ-आह किए जा रहा हूँ मैं
फ़र्द-ए-अमल सियाह किए जा रहा हूँ मैं
रहमत को बे-पनाह किए जा रहा हूँ मैं
ऐसी भी इक निगाह किए जा रहा हूँ मैं
ज़र्रों को मेहर-ओ-माह किए जा रहा हूँ मैं
मुझ से लगे है... |
aankhon-kaa-thaa-qusuur-na-dil-kaa-qusuur-thaa-jigar-moradabadi-ghazals |
आँखों का था क़ुसूर न दिल का क़ुसूर था
आया जो मेरे सामने मेरा ग़ुरूर था
तारीक मिस्ल-ए-आह जो आँखों का नूर था
क्या सुब्ह ही से शाम-ए-बला का ज़ुहूर था
वो थे न मुझ से दूर न मैं उन से दूर था
आता न था नज़र तो नज़र का क़ुसूर था
हर वक़्त इक ख़ुमार था हर दम सुरूर था
बोतल बग़ल में थी कि दिल-ए-ना-सुबूर था
कोई तो दर्दमंद-ए... |
shab-e-firaaq-hai-aur-niind-aaii-jaatii-hai-jigar-moradabadi-ghazals |
शब-ए-फ़िराक़ है और नींद आई जाती है
कुछ इस में उन की तवज्जोह भी पाई जाती है
ये उम्र-ए-इश्क़ यूँही क्या गँवाई जाती है
हयात ज़िंदा हक़ीक़त बनाई जाती है
बना बना के जो दुनिया मिटाई जाती है
ज़रूर कोई कमी है कि पाई जाती है
हमीं पे इश्क़ की तोहमत लगाई जाती है
मगर ये शर्म जो चेहरे पे छाई जाती है
ख़ुदा करे कि हक़ीक़त मे... |
nazar-milaa-ke-mire-paas-aa-ke-luut-liyaa-jigar-moradabadi-ghazals |
नज़र मिला के मिरे पास आ के लूट लिया
नज़र हटी थी कि फिर मुस्कुरा के लूट लिया
शिकस्त-ए-हुस्न का जल्वा दिखा के लूट लिया
निगाह नीची किए सर झुका के लूट लिया
दुहाई है मिरे अल्लाह की दुहाई है
किसी ने मुझ से भी मुझ को छुपा के लूट लिया
सलाम उस पे कि जिस ने उठा के पर्दा-ए-दिल
मुझी में रह के मुझी में समा के लूट लिया
उन्ह... |
kaam-aakhir-jazba-e-be-ikhtiyaar-aa-hii-gayaa-jigar-moradabadi-ghazals |
काम आख़िर जज़्बा-ए-बे-इख़्तियार आ ही गया
दिल कुछ इस सूरत से तड़पा उन को प्यार आ ही गया
जब निगाहें उठ गईं अल्लाह-री मेराज-शौक़
देखता क्या हूँ वो जान-ए-इंतिज़ार आ ही गया
हाए ये हुस्न-ए-तसव्वुर का फ़रेब-ए-रंग-ओ-बू
मैं ये समझा जैसे वो जान-ए-बहार आ ही गया
हाँ सज़ा दे ऐ ख़ुदा-ए-इश्क़ ऐ तौफ़ीक़-ए-ग़म
फिर ज़बान-ए-बे-अद... |
ishq-ko-be-naqaab-honaa-thaa-jigar-moradabadi-ghazals |
इश्क़ को बे-नक़ाब होना था
आप अपना जवाब होना था
मस्त-ए-जाम-ए-शराब होना था
बे-ख़ुद-ए-इज़्तिराब होना था
तेरी आँखों का कुछ क़ुसूर नहीं
हाँ मुझी को ख़राब होना था
आओ मिल जाओ मुस्कुरा के गले
हो चुका जो इताब होना था
कूचा-ए-इश्क़ में निकल आया
जिस को ख़ाना-ख़राब होना था
मस्त-ए-जाम-ए-शराब ख़ाक होते
ग़र्क़-ए-जाम-ए-शराब... |
kasrat-men-bhii-vahdat-kaa-tamaashaa-nazar-aayaa-jigar-moradabadi-ghazals |
कसरत में भी वहदत का तमाशा नज़र आया
जिस रंग में देखा तुझे यकता नज़र आया
जब उस रुख़-ए-पुर-नूर का जल्वा नज़र आया
काबा नज़र आया न कलीसा नज़र आया
ये हुस्न ये शोख़ी ये करिश्मा ये अदाएँ
दुनिया नज़र आई मुझे तो क्या नज़र आया
इक सरख़ुशी-ए-इश्क़ है इक बे-ख़ुदी-ए-शौक़
आँखों को ख़ुदा जाने मिरी क्या नज़र आया
जब देख न सकते थ... |
ye-misraa-kaash-naqsh-e-har-dar-o-diivaar-ho-jaae-jigar-moradabadi-ghazals |
ये मिस्रा काश नक़्श-ए-हर-दर-ओ-दीवार हो जाए
जिसे जीना हो मरने के लिए तय्यार हो जाए
वही मय-ख़्वार है जो इस तरह मय-ख़्वार हो जाए
कि शीशा तोड़ दे और बे-पिए सरशार हो जाए
दिल-ए-इंसाँ अगर शाइस्ता-ए-असरार हो जाए
लब-ए-ख़ामोश-फ़ितरत ही लब-ए-गुफ़्तार हो जाए
हर इक बे-कार सी हस्ती ब-रू-ए-कार हो जाए
जुनूँ की रूह-ए-ख़्वाबीदा ... |
duniyaa-ke-sitam-yaad-na-apnii-hii-vafaa-yaad-jigar-moradabadi-ghazals |
दुनिया के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद
अब मुझ को नहीं कुछ भी मोहब्बत के सिवा याद
मैं शिकवा ब-लब था मुझे ये भी न रहा याद
शायद कि मिरे भूलने वाले ने किया याद
छेड़ा था जिसे पहले-पहल तेरी नज़र ने
अब तक है वो इक नग़्मा-ए-बे-साज़-ओ-सदा याद
जब कोई हसीं होता है सरगर्म-ए-नवाज़िश
उस वक़्त वो कुछ और भी आते हैं सिवा याद
क्... |
kuchh-is-adaa-se-aaj-vo-pahluu-nashiin-rahe-jigar-moradabadi-ghazals |
कुछ इस अदा से आज वो पहलू-नशीं रहे
जब तक हमारे पास रहे हम नहीं रहे
ईमान-ओ-कुफ़्र और न दुनिया-ओ-दीं रहे
ऐ इश्क़-ए-शाद-बाश कि तन्हा हमीं रहे
आलम जब एक हाल पे क़ाएम नहीं रहे
क्या ख़ाक ए'तिबार-ए-निगाह-ए-यक़ीं रहे
मेरी ज़बाँ पे शिकवा-ए-दर्द-आफ़रीं रहे
शायद मिरे हवास ठिकाने नहीं रहे
जब तक इलाही जिस्म में जान-ए-हज़ीं ... |
ik-lafz-e-mohabbat-kaa-adnaa-ye-fasaanaa-hai-jigar-moradabadi-ghazals |
इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है
ये किस का तसव्वुर है ये किस का फ़साना है
जो अश्क है आँखों में तस्बीह का दाना है
दिल संग-ए-मलामत का हर-चंद निशाना है
दिल फिर भी मिरा दिल है दिल ही तो ज़माना है
हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है
रोने को नहीं कोई हँसने को ज़माना ह... |
baraabar-se-bach-kar-guzar-jaane-vaale-jigar-moradabadi-ghazals |
बराबर से बच कर गुज़र जाने वाले
ये नाले नहीं बे-असर जाने वाले
नहीं जानते कुछ कि जाना कहाँ है
चले जा रहे हैं मगर जाने वाले
मिरे दिल की बेताबियाँ भी लिए जा
दबे पाँव मुँह फेर कर जाने वाले
तिरे इक इशारे पे साकित खड़े हैं
नहीं कह के सब से गुज़र जाने वाले
मोहब्बत में हम तो जिए हैं जिएँगे
वो होंगे कोई और मर जाने वाले... |
be-kaif-dil-hai-aur-jiye-jaa-rahaa-huun-main-jigar-moradabadi-ghazals |
बे-कैफ़ दिल है और जिए जा रहा हूँ मैं
ख़ाली है शीशा और पिए जा रहा हूँ मैं
पैहम जो आह आह किए जा रहा हूँ मैं
दौलत है ग़म ज़कात दिए जा रहा हूँ मैं
मजबूरी-ए-कमाल-ए-मोहब्बत तो देखना
जीना नहीं क़ुबूल जिए जा रहा हूँ मैं
वो दिल कहाँ है अब कि जिसे प्यार कीजिए
मजबूरियाँ हैं साथ दिए जा रहा हूँ मैं
रुख़्सत हुई शबाब के हमरा... |
ishq-men-laa-javaab-hain-ham-log-jigar-moradabadi-ghazals |
इश्क़ में ला-जवाब हैं हम लोग
माहताब आफ़्ताब हैं हम लोग
गरचे अहल-ए-शराब हैं हम लोग
ये न समझो ख़राब हैं हम लोग
शाम से आ गए जो पीने पर
सुब्ह तक आफ़्ताब हैं हम लोग
हम को दावा-ए-इश्क़-बाज़ी है
मुस्तहिक़्क़-ए-अज़ाब हैं हम लोग
नाज़ करती है ख़ाना-वीरानी
ऐसे ख़ाना-ख़राब हैं हम लोग
हम नहीं जानते ख़िज़ाँ क्या है
कुश्त... |
shaaer-e-fitrat-huun-jab-bhii-fikr-farmaataa-huun-main-jigar-moradabadi-ghazals |
शाएर-ए-फ़ितरत हूँ जब भी फ़िक्र फ़रमाता हूँ मैं
रूह बन कर ज़र्रे ज़र्रे में समा जाता हूँ मैं
आ कि तुझ बिन इस तरह ऐ दोस्त घबराता हूँ मैं
जैसे हर शय में किसी शय की कमी पाता हूँ मैं
जिस क़दर अफ़्साना-ए-हस्ती को दोहराता हूँ मैं
और भी बे-गाना-ए-हस्ती हुआ जाता हूँ मैं
जब मकान-ओ-ला-मकाँ सब से गुज़र जाता हूँ मैं
अल्लाह ... |
aankhon-men-bas-ke-dil-men-samaa-kar-chale-gae-jigar-moradabadi-ghazals |
आँखों में बस के दिल में समा कर चले गए
ख़्वाबीदा ज़िंदगी थी जगा कर चले गए
हुस्न-ए-अज़ल की शान दिखा कर चले गए
इक वाक़िआ' सा याद दिला कर चले गए
चेहरे तक आस्तीन वो ला कर चले गए
क्या राज़ था कि जिस को छुपा कर चले गए
रग रग में इस तरह वो समा कर चले गए
जैसे मुझी को मुझ से चुरा कर चले गए
मेरी हयात-ए-इश्क़ को दे कर जुनू... |
kabhii-shaakh-o-sabza-o-barg-par-kabhii-guncha-o-gul-o-khaar-par-jigar-moradabadi-ghazals |
कभी शाख़ ओ सब्ज़ा ओ बर्ग पर कभी ग़ुंचा ओ गुल ओ ख़ार पर
मैं चमन में चाहे जहाँ रहूँ मिरा हक़ है फ़स्ल-ए-बहार पर
मुझे दें न ग़ैज़ में धमकियाँ गिरें लाख बार ये बिजलियाँ
मिरी सल्तनत ये ही आशियाँ मिरी मिलकियत ये ही चार पर
जिन्हें कहिए इश्क़ की वुसअ'तें जो हैं ख़ास हुस्न की अज़्मतें
ये उसी के क़ल्ब से पूछिए जिसे फ़ख़्र ... |
koii-ye-kah-de-gulshan-gulshan-jigar-moradabadi-ghazals |
कोई ये कह दे गुलशन गुलशन
लाख बलाएँ एक नशेमन
क़ातिल रहबर क़ातिल रहज़न
दिल सा दोस्त न दिल सा दुश्मन
फूल खिले हैं गुलशन गुलशन
लेकिन अपना अपना दामन
इश्क़ है प्यारे खेल नहीं है
इश्क़ है कार-ए-शीशा-ओ-आहन
ख़ैर मिज़ाज-ए-हुस्न की या-रब
तेज़ बहुत है दिल की धड़कन
आ कि न जाने तुझ बिन कब से
रूह है लाशा जिस्म है मदफ़न
आ... |
jo-tuufaanon-men-palte-jaa-rahe-hain-jigar-moradabadi-ghazals |
जो तूफ़ानों में पलते जा रहे हैं
वही दुनिया बदलते जा रहे हैं
निखरता आ रहा है रंग-ए-गुलशन
ख़स ओ ख़ाशाक जलते जा रहे हैं
वहीं मैं ख़ाक उड़ती देखता हूँ
जहाँ चश्मे उबलते जा रहे हैं
चराग़-ए-दैर-ओ-काबा अल्लाह अल्लाह
हवा की ज़िद पे जलते जा रहे हैं
शबाब ओ हुस्न में बहस आ पड़ी है
नए पहलू निकलते जा रहे हैं |
aaj-kyaa-haal-hai-yaarab-sar-e-mahfil-meraa-jigar-moradabadi-ghazals |
आज क्या हाल है यारब सर-ए-महफ़िल मेरा
कि निकाले लिए जाता है कोई दिल मेरा
सोज़-ए-ग़म देख न बरबाद हो हासिल मेरा
दिल की तस्वीर है हर आईना-ए-दिल मेरा
सुब्ह तक हिज्र में क्या जानिए क्या होता है
शाम ही से मिरे क़ाबू में नहीं दिल मेरा
मिल गई इश्क़ में ईज़ा-तलबी से राहत
ग़म है अब जान मिरी दर्द है अब दिल मेरा
पाया जाता ... |
sab-pe-tuu-mehrbaan-hai-pyaare-jigar-moradabadi-ghazals |
सब पे तू मेहरबान है प्यारे
कुछ हमारा भी ध्यान है प्यारे
आ कि तुझ बिन बहुत दिनों से ये दिल
एक सूना मकान है प्यारे
तू जहाँ नाज़ से क़दम रख दे
वो ज़मीन आसमान है प्यारे
मुख़्तसर है ये शौक़ की रूदाद
हर नफ़स दास्तान है प्यारे
अपने जी में ज़रा तो कर इंसाफ़
कब से ना-मेहरबान है प्यारे
सब्र टूटे हुए दिलों का न ले
तू ... |
vo-adaa-e-dilbarii-ho-ki-navaa-e-aashiqaana-jigar-moradabadi-ghazals |
वो अदा-ए-दिलबरी हो कि नवा-ए-आशिक़ाना
जो दिलों को फ़त्ह कर ले वही फ़ातेह-ए-ज़माना
ये तिरा जमाल-ए-कामिल ये शबाब का ज़माना
दिल-ए-दुश्मनाँ सलामत दिल-ए-दोस्ताँ निशाना
कभी हुस्न की तबीअत न बदल सका ज़माना
वही नाज़-ए-बे-नियाज़ी वही शान-ए-ख़ुसरवाना
मैं हूँ उस मक़ाम पर अब कि फ़िराक़ ओ वस्ल कैसे
मिरा इश्क़ भी कहानी तिरा ह... |
use-haal-o-qaal-se-vaasta-na-garaz-maqaam-o-qayaam-se-jigar-moradabadi-ghazals |
उसे हाल-ओ-क़ाल से वास्ता न ग़रज़ मक़ाम-ओ-क़याम से
जिसे कोई निस्बत-ए-ख़ास हो तिरे हुस्न-ए-बर्क़-ख़िराम से
मुझे दे रहे हैं तसल्लियाँ वो हर एक ताज़ा पयाम से
कभी आ के मंज़र-ए-आम पर कभी हट के मंज़र-ए-आम से
क्यूँ किया रहा जो मुक़ाबला ख़तरात-ए-गाम-ब-गाम से
सर-ए-बाम-ए-इश्क़-ए-तमाम तक रह-ए-शौक़-ए-नीम-तमाम से
न ग़रज़ किसी... |
daastaan-e-gam-e-dil-un-ko-sunaaii-na-gaii-jigar-moradabadi-ghazals |
दास्तान-ए-ग़म-ए-दिल उन को सुनाई न गई
बात बिगड़ी थी कुछ ऐसी कि बनाई न गई
सब को हम भूल गए जोश-ए-जुनूँ में लेकिन
इक तिरी याद थी ऐसी जो भुलाई न गई
इश्क़ पर कुछ न चला दीदा-ए-तर का क़ाबू
उस ने जो आग लगा दी वो बुझाई न गई
पड़ गया हुस्न-ए-रुख़-ए-यार का परतव जिस पर
ख़ाक में मिल के भी इस दिल की सफ़ाई न गई
क्या उठाएगी सबा... |
jehl-e-khirad-ne-din-ye-dikhaae-jigar-moradabadi-ghazals |
जेहल-ए-ख़िरद ने दिन ये दिखाए
घट गए इंसाँ बढ़ गए साए
हाए वो क्यूँकर दिल बहलाए
ग़म भी जिस को रास न आए
ज़िद पर इश्क़ अगर आ जाए
पानी छिड़के आग लगाए
दिल पे कुछ ऐसा वक़्त पड़ा है
भागे लेकिन राह न पाए
कैसा मजाज़ और कैसी हक़ीक़त
अपने ही जल्वे अपने ही साए
झूटी है हर एक मसर्रत
रूह अगर तस्कीन न पाए
कार-ए-ज़माना जितना... |
kyaa-baraabar-kaa-mohabbat-men-asar-hotaa-hai-jigar-moradabadi-ghazals |
क्या बराबर का मोहब्बत में असर होता है
दिल इधर होता है ज़ालिम न उधर होता है
हम ने क्या कुछ न किया दीदा-ए-दिल की ख़ातिर
लोग कहते हैं दुआओं में असर होता है
दिल तो यूँ दिल से मिलाया कि न रक्खा मेरा
अब नज़र के लिए क्या हुक्म-ए-नज़र होता है
मैं गुनहगार-ए-जुनूँ मैं ने ये माना लेकिन
कुछ उधर से भी तक़ाज़ा-ए-नज़र होता है... |
tire-jamaal-e-haqiiqat-kii-taab-hii-na-huii-jigar-moradabadi-ghazals |
तिरे जमाल-ए-हक़ीक़त की ताब ही न हुई
हज़ार बार निगह की मगर कभी न हुई
तिरी ख़ुशी से अगर ग़म में भी ख़ुशी न हुई
वो ज़िंदगी तो मोहब्बत की ज़िंदगी न हुई
कहाँ वो शोख़ मुलाक़ात ख़ुद से भी न हुई
बस एक बार हुई और फिर कभी न हुई
वो हम हैं अहल-ए-मोहब्बत कि जान से दिल से
बहुत बुख़ार उठे आँख शबनमी न हुई
ठहर ठहर दिल-ए-बेताब ... |
agar-na-zohra-jabiinon-ke-darmiyaan-guzre-jigar-moradabadi-ghazals |
अगर न ज़ोहरा-जबीनों के दरमियाँ गुज़रे
तो फिर ये कैसे कटे ज़िंदगी कहाँ गुज़रे
जो तेरे आरिज़ ओ गेसू के दरमियाँ गुज़रे
कभी कभी वही लम्हे बला-ए-जाँ गुज़रे
मुझे ये वहम रहा मुद्दतों कि जुरअत-ए-शौक़
कहीं न ख़ातिर-ए-मासूम पर गिराँ गुज़रे
हर इक मक़ाम-ए-मोहब्बत बहुत ही दिलकश था
मगर हम अहल-ए-मोहब्बत कशाँ कशाँ गुज़रे
जुनू... |
do-chaar-gaam-raah-ko-hamvaar-dekhnaa-nida-fazli-ghazals |
दो चार गाम राह को हमवार देखना
फिर हर क़दम पे इक नई दीवार देखना
आँखों की रौशनी से है हर संग आईना
हर आइने में ख़ुद को गुनहगार देखना
हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिस को भी देखना हो कई बार देखना
मैदाँ की हार जीत तो क़िस्मत की बात है
टूटी है किस के हाथ में तलवार देखना
दरिया के इस किनारे सितारे भी फूल भी
दरिया ... |
be-naam-saa-ye-dard-thahar-kyuun-nahiin-jaataa-nida-fazli-ghazals |
बे-नाम सा ये दर्द ठहर क्यूँ नहीं जाता
जो बीत गया है वो गुज़र क्यूँ नहीं जाता
सब कुछ तो है क्या ढूँढती रहती हैं निगाहें
क्या बात है मैं वक़्त पे घर क्यूँ नहीं जाता
वो एक ही चेहरा तो नहीं सारे जहाँ में
जो दूर है वो दिल से उतर क्यूँ नहीं जाता
मैं अपनी ही उलझी हुई राहों का तमाशा
जाते हैं जिधर सब मैं उधर क्यूँ नहीं ... |
garaj-baras-pyaasii-dhartii-phir-paanii-de-maulaa-nida-fazli-ghazals |
गरज-बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला
चिड़ियों को दाने बच्चों को गुड़-धानी दे मौला
दो और दो का जोड़ हमेशा चार कहाँ होता है
सोच समझ वालों को थोड़ी नादानी दे मौला
फिर रौशन कर ज़हर का प्याला चमका नई सलीबें
झूटों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला
फिर मूरत से बाहर आ कर चारों ओर बिखर जा
फिर मंदिर को कोई 'मीरा' दीव... |
mutthii-bhar-logon-ke-haathon-men-laakhon-kii-taqdiiren-hain-nida-fazli-ghazals |
मुट्ठी भर लोगों के हाथों में लाखों की तक़दीरें हैं
जुदा जुदा हैं धर्म इलाक़े एक सी लेकिन ज़ंजीरें हैं
आज और कल की बात नहीं है सदियों की तारीख़ यही है
हर आँगन में ख़्वाब हैं लेकिन चंद घरों में ताबीरें हैं
जब भी कोई तख़्त सजा है मेरा तेरा ख़ून बहा है
दरबारों की शान-ओ-शौकत मैदानों की शमशीरें हैं
हर जंगल की एक कहानी... |
kabhii-kabhii-yuun-bhii-ham-ne-apne-jii-ko-bahlaayaa-hai-nida-fazli-ghazals |
कभी कभी यूँ भी हम ने अपने जी को बहलाया है
जिन बातों को ख़ुद नहीं समझे औरों को समझाया है
हम से पूछो इज़्ज़त वालों की इज़्ज़त का हाल कभी
हम ने भी इक शहर में रह कर थोड़ा नाम कमाया है
उस को भूले बरसों गुज़रे लेकिन आज न जाने क्यूँ
आँगन में हँसते बच्चों को बे-कारन धमकाया है
उस बस्ती से छुट कर यूँ तो हर चेहरे को याद कि... |
achchhii-nahiin-ye-khaamushii-shikva-karo-gila-karo-nida-fazli-ghazals |
अच्छी नहीं ये ख़ामुशी शिकवा करो गिला करो
यूँ भी न कर सको तो फिर घर में ख़ुदा ख़ुदा करो
शोहरत भी उस के साथ है दौलत भी उस के हाथ है
ख़ुद से भी वो मिले कभी उस के लिए दुआ करो
देखो ये शहर है अजब दिल भी नहीं है कम ग़ज़ब
शाम को घर जो आऊँ मैं थोड़ा सा सज लिया करो
दिल में जिसे बसाओ तुम चाँद उसे बनाओ तुम
वो जो कहे पढ़ा क... |
yaqiin-chaand-pe-suuraj-men-e-tibaar-bhii-rakh-nida-fazli-ghazals |
यक़ीन चाँद पे सूरज में ए'तिबार भी रख
मगर निगाह में थोड़ा सा इंतिज़ार भी रख
ख़ुदा के हाथ में मत सौंप सारे कामों को
बदलते वक़्त पे कुछ अपना इख़्तियार भी रख
ये ही लहू है शहादत ये ही लहू पानी
ख़िज़ाँ नसीब सही ज़ेहन में बहार भी रख
घरों के ताक़ों में गुल-दस्ते यूँ नहीं सजते
जहाँ हैं फूल वहीं आस-पास ख़ार भी रख
पहाड़ ... |
jise-dekhte-hii-khumaarii-lage-nida-fazli-ghazals |
जिसे देखते ही ख़ुमारी लगे
उसे उम्र सारी हमारी लगे
उजाला सा है उस के चारों तरफ़
वो नाज़ुक बदन पाँव भारी लगे
वो ससुराल से आई है माइके
उसे जितना देखो वो प्यारी लगे
हसीन सूरतें और भी हैं मगर
वो सब सैकड़ों में हज़ारी लगे
चलो इस तरह से सजाएँ उसे
ये दुनिया हमारी तुम्हारी लगे
उसे देखना शेर-गोई का फ़न
उसे सोचना दीन-... |
dekhaa-huaa-saa-kuchh-hai-to-sochaa-huaa-saa-kuchh-nida-fazli-ghazals |
देखा हुआ सा कुछ है तो सोचा हुआ सा कुछ
हर वक़्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ
होता है यूँ भी रास्ता खुलता नहीं कहीं
जंगल सा फैल जाता है खोया हुआ सा कुछ
साहिल की गीली रेत पर बच्चों के खेल सा
हर लम्हा मुझ में बनता बिखरता हुआ सा कुछ
फ़ुर्सत ने आज घर को सजाया कुछ इस तरह
हर शय से मुस्कुराता है रोता हुआ सा कुछ
धुँदली स... |
nazdiikiyon-men-duur-kaa-manzar-talaash-kar-nida-fazli-ghazals |
नज़दीकियों में दूर का मंज़र तलाश कर
जो हाथ में नहीं है वो पत्थर तलाश कर
सूरज के इर्द-गिर्द भटकने से फ़ाएदा
दरिया हुआ है गुम तो समुंदर तलाश कर
तारीख़ में महल भी है हाकिम भी तख़्त भी
गुमनाम जो हुए हैं वो लश्कर तलाश कर
रहता नहीं है कुछ भी यहाँ एक सा सदा
दरवाज़ा घर का खोल के फिर घर तलाश कर
कोशिश भी कर उमीद भी रख र... |
koshish-ke-baavajuud-ye-ilzaam-rah-gayaa-nida-fazli-ghazals |
कोशिश के बावजूद ये इल्ज़ाम रह गया
हर काम में हमेशा कोई काम रह गया
छोटी थी उम्र और फ़साना तवील था
आग़ाज़ ही लिखा गया अंजाम रह गया
उठ उठ के मस्जिदों से नमाज़ी चले गए
दहशत-गरों के हाथ में इस्लाम रह गया
उस का क़ुसूर ये था बहुत सोचता था वो
वो कामयाब हो के भी नाकाम रह गया
अब क्या बताएँ कौन था क्या था वो एक शख़्स
गि... |
jo-ho-ik-baar-vo-har-baar-ho-aisaa-nahiin-hotaa-nida-fazli-ghazals |
जो हो इक बार वो हर बार हो ऐसा नहीं होता
हमेशा एक ही से प्यार हो ऐसा नहीं होता
हर इक कश्ती का अपना तजरबा होता है दरिया में
सफ़र में रोज़ ही मंजधार हो ऐसा नहीं होता
कहानी में तो किरदारों को जो चाहे बना दीजे
हक़ीक़त भी कहानी-कार हो ऐसा नहीं होता
कहीं तो कोई होगा जिस को अपनी भी ज़रूरत हो
हर इक बाज़ी में दिल की हार ... |
kuchh-bhii-bachaa-na-kahne-ko-har-baat-ho-gaii-nida-fazli-ghazals |
कुछ भी बचा न कहने को हर बात हो गई
आओ कहीं शराब पिएँ रात हो गई
फिर यूँ हुआ कि वक़्त का पाँसा पलट गया
उम्मीद जीत की थी मगर मात हो गई
सूरज को चोंच में लिए मुर्ग़ा खड़ा रहा
खिड़की के पर्दे खींच दिए रात हो गई
वो आदमी था कितना भला कितना पुर-ख़ुलूस
उस से भी आज लीजे मुलाक़ात हो गई
रस्ते में वो मिला था मैं बच कर गुज़र ... |
apnii-marzii-se-kahaan-apne-safar-ke-ham-hain-nida-fazli-ghazals |
अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफ़र के हम हैं
रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं
पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं
वक़्त के साथ है मिटी का सफ़र सदियों से
किस को मालूम कहाँ के हैं किधर के हम हैं
चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफ़िर का नसीब
सोचते रहते हैं किस राहगुज़र के हम हैं... |
hosh-vaalon-ko-khabar-kyaa-be-khudii-kyaa-chiiz-hai-nida-fazli-ghazals |
होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है
उन से नज़रें क्या मिलीं रौशन फ़ज़ाएँ हो गईं
आज जाना प्यार की जादूगरी क्या चीज़ है
बिखरी ज़ुल्फ़ों ने सिखाई मौसमों को शाइ'री
झुकती आँखों ने बताया मय-कशी क्या चीज़ है
हम लबों से कह न पाए उन से हाल-ए-दिल कभी
और वो समझे नहीं ये ख... |
aaj-zaraa-fursat-paaii-thii-aaj-use-phir-yaad-kiyaa-nida-fazli-ghazals-3 |
आज ज़रा फ़ुर्सत पाई थी आज उसे फिर याद किया
बंद गली के आख़िरी घर को खोल के फिर आबाद किया
खोल के खिड़की चाँद हँसा फिर चाँद ने दोनों हाथों से
रंग उड़ाए फूल खिलाए चिड़ियों को आज़ाद किया
बड़े बड़े ग़म खड़े हुए थे रस्ता रोके राहों में
छोटी छोटी ख़ुशियों से ही हम ने दिल को शाद किया
बात बहुत मा'मूली सी थी उलझ गई तकरारों... |
raat-ke-baad-nae-din-kii-sahar-aaegii-nida-fazli-ghazals |
रात के बा'द नए दिन की सहर आएगी
दिन नहीं बदलेगा तारीख़ बदल जाएगी
हँसते हँसते कभी थक जाओ तो छुप के रो लो
ये हँसी भीग के कुछ और चमक जाएगी
जगमगाती हुई सड़कों पे अकेले न फिरो
शाम आएगी किसी मोड़ पे डस जाएगी
और कुछ देर यूँही जंग सियासत मज़हब
और थक जाओ अभी नींद कहाँ आएगी
मेरी ग़ुर्बत को शराफ़त का अभी नाम न दे
वक़्त ब... |
main-apne-ikhtiyaar-men-huun-bhii-nahiin-bhii-huun-nida-fazli-ghazals |
मैं अपने इख़्तियार में हूँ भी नहीं भी हूँ
दुनिया के कारोबार में हूँ भी नहीं भी हूँ
तेरी ही जुस्तुजू में लगा है कभी कभी
मैं तेरे इंतिज़ार में हूँ भी नहीं भी हूँ
फ़िहरिस्त मरने वालों की क़ातिल के पास है
मैं अपने ही मज़ार में हूँ भी नहीं भी हूँ
औरों के साथ ऐसा कोई मसअला नहीं
इक मैं ही इस दयार में हूँ भी नहीं भी हू... |
Subsets and Splits
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